शनिवार, 6 जुलाई 2013

बैंगनी फूलों वाला पेड़



बैंगनी फूलों वाला पेड़








चाणक्यपुरी वाला हमारा सरकारी बंगला, जहां दिल्ली, दिल्ली है ऐसा कम ही लगता। साफ-सुथरा वीआईपी एरिया। इतनी हरियाली दिल्ली के किसी और इलाके में शायद ही देखने को मिले। हमारे घर के सामने तो जैसे सघन अशोक वाटिका ही बनी थी। यह एक हरा-भरा सरकारी बगीचा है। बगीचे में तमाम तरह के पेड़-पौधे हैं। पर मेरी .ष्टि में बगीचे में सबसे खूबसूरत पेड़ वही है जिसके ऊपर गर्मी-भर बैंगनी रंग के फूल खिलते हैं। हर बार जब भी वह पेड़ बैंगनी फूलों से लद जाता, मैं उसका नाम जानने को उतावली होती-कई बार किताबों, पत्र-पत्रिकाओं के पन्ने पलटती, शायद इस पेड़ का वर्णन या फोटो दिख जाए, पर आज तक नहीं जान पाई इसका नाम। लंबे तनेवाले इस पेड़ के शीर्ष पर फैले छोटे-छोटे जामुनी रंग के फूल और कलियों के गुच्छे मुझे किसी ग्रामीण स्त्री की वायल की फूलोंवाली चुनरी जैसे लगते। घर के बाईं तरफवाली खिड़की खोलते ही ध्यान उधर चला जाता। काफी बड़े क्षेत्र में पेड़ की छत्रछाया फैली हुई। गुलमोहर जैसे आकार-प्रकार के इस पेड़ पर तरह-तरह के पंछी अपना बसेरा बनाए रहते हैं। फागुन के बाद तपती दोपहर में जब ज्यादातर पेड़ पतझड़ का गम मना रहे होते हैं या फिर अंगारे जैसे सुर्ख रंग के फूलों से धधकते लगते हैं ऐसे में शांत बैंगनी रंग के फूलों से ढका यह पेड़ आंखों और दिल को सकून देता है। पेड़ के नीचे ज्यादातर छांव रहती है। शायद इसीलिए वहां एक बेंच भी लगी है। अक्सर राहगीर उस बेंच पर सुस्ता लेते हैं। शाम को मोहल्ले के कुछ बुजुर्ग एकत्र होते हैं। बहुत बार मेरा भी मन करता उस ठंडक में जाकर कुछ बिखरे बैंगनी फूल  उठा लाऊं।

      एक दोपहर जब गर्मी अभी शेष थी और ठंडी-गरम मिली-जुली हवा स्पर्श कर रही थी, मैं सोनरंग की वायल में फूल टांकती अपने कमरे में बैठी थी। खिड़की खुली थी और रेडियो पर मेरा मनपसंद गजलों का कार्यक्रम बज रहा था-उस भरी दोपहर में खिड़की से मेरी नजर पेड़ की तरफ गई तो मैंने देखा, पेड़ के नीचे एक लड़का और एक लड़की बैठे हैं। वे दोनों अपने-आपमें ही मग्न थे-जाने क्यूं अच्छा लगा उन्हें दुखकर। मैं कुछ देर देखती रही। फिर अनायास ही मैं मुस्करा उठी और खिड़की बंद कर, आंखें मूंद लेट गई। लड़का और लड़की खयालों में ही रहे-प्यार की गुनगुनी दोपहर ऐसी ही होती है- एक राहत भरी छांह को तलाशती हुई। धुंधलाती स्मृतियों में ऐसी ही किसी दोपहरी में बरसों पहले एक ग्रीटिंग कार्ड स्केच के ऊपर खिली गुलजार की पंक्तियों का शब्द-शब्द याद आने लगा-


            याद है, एक दिन
            मेरे मेज पे बैठे-बैठे
            सिगरेट की डिबिया पर तुमने
            छोटे-से इस पौधे का
            एक स्केच बनाया था!
            आकर देखो,
            उस पौधे पर फूल आया है!

      जब-जब भी अपने बगीचे के आम पर बौर आते रहे ये पंक्तियां याद करती रही... हां, चुपचाप पौधे पर फूल खिलते रहे। यह विचार उठता रहा कि यह पेड़ इन पंछी जैसे लड़के-लड़की को भी एक बसेरस बसाने का सुंदर सपना दे रहा है। करवट बदल सोने की कोशिश करती, पर थकान के बावजूद नींद नहीं आनी थी न आई!सधे रिकॉर्ड की तरह दिमाग पर कुछ विस्मृत तरंगें उठने लगीं। मैं बेचैन अहसास के साथ फिर करवट बदलती हूं, पर लगा, वह लड़का और लड़की और वह बैंगनी फूलोंवाला पेड़ मेरे स्मृति-पटल से विस्मृत होने के भ्रम की धूल झाड़ रहे हैं-क्या हो गया है मुझे?उठकर बैठ जाती हूं। एक कुनमुनाहट-सी भीतर रेंगने लगती है। मैंने खिड़की खोल दी। तपी हुई हवा का एक झोंका घर में प्रवेश कर गया। मेरी नजरें फिर पेड़ के नीचे गईं, अब लड़का और लड़की जा चुके थे। वहां कोई नहीं था। उस रिक्त हुए स्थान पर कुछ बैंगनी फूल झड़े हुए थे। फूल मुस्करा रहे थे। शायद प्यार की उनकी छोटी-सी मुलाकात का अहसास वहां मौजूद था। मैं पलटी। रेडियो पर अंतिम गजल बज रही थी-
            पसीने-पसीने हुए जा रहे हो,
            तुम दोनों कहां से चले आ रहे हो...

जगजीत सिंह चित्रा सिंह के प्यार की सारी कशिश उनक स्वर में उतर आती है। उठकर मैं किचन में गई और चाय बनाकर ले आई। खाली घर में जाने क्यूं लगने लगा, मैं अकेली नहीं हूं। एक अहसास है जो मेरे साथ-साथ चल-फिर रहा है। चाय का कप पकड़े-पकड़े खयाल आया कि लंबे अरसे बाद आज फिर दोपहर में चाय की तलब?क्या मतलब है इसका?नौकरी छोड़ने और शादी होने के बाद से दोपहर में चाय तो मैंने पी ही नहीं थी।
अगला दिन-फिर वही दोपहर, वही मैं और मेरा खालीपन। आम के पेड़ पर तोते बोल रहे थे-उनकी आवाज के साथ मैं कमरे से बाहर आ गई और आम के पेड़ के नीचे चली गई। एक अलग ही अहसास फैलने लगा मेरे वजूद पर। आम की पत्तियां तोड़कर हथेली पर मसल डाली, पत्तियों की महक अच्छी लगती है मुझे। यादों की महक-सी छाने लगी मुझ पर...तुम कितना चिढ़ते थे, मेरी इस आदत पर...सारे हाथ गंदे कर लेती हो तनु, एलर्जी हो जाएगी। मैं इन पत्तियों को सूंघती थी और छींकें तुम्हें आती थीं। कितना सुखद होता था वो लंच टाइम जब हम चाय की गुमटी के पीछेवाले आम के पेड़ों के झुरमुट के नीचे जा बैठते थे। तुम मेरे लंच बॉक्स में रोज आम का अचार देखते ही मुस्कराने लगते थे। ''तनु, थोड़े आम के पत्ते घर ले जाओ, सब्जी बना लेना। तुम्हारा बस चले तो तुम आम के पत्ते भी खाने लगोगी।
      ''हां तो, तुम्हें भी खिलाऊंगी, क्या बिगाड़ा है आम के पेड़ ने तुम्हारा?बैठते तो रोज यहीं हैं ?''
      ''अच्छा, बाबा  अच्छा है, जनाब यह छत्रछाया आपकी है हम पर खट्टी-मिट्ठी।''
      ''हां, अब आई अकल।''
''अच्छा तनु, अगर ये नीम का पेड़ होता तो क्या तुन निबोली का अचार डालतीं?''
''हां डालती, 'प्रणव छाप निबोली अचार'। डालती और तुम्हें ही खिलाती, समझे! ''
''प्रणव, तुमसेअलग हो यादों की निबोली ही तो समेट रही हूं...''
अगली दोपहर फिर तोते मेरे बगीचे के अमरूद कच्चे ही गिराकर उड़ गए। मैं अमरूद उठा अंदर आने लगी अनायास ही नजर सामनेवाली बेंच पर चली गई। आज फिर वही लड़का और लड़की वहां आकर बैठे थे। मैंने घड़ी पर नजर डाली-एक बजकर तीस मिनट। ओ...लंच टाइम!मैं कमरे में आ गई। रेडियो ऑन किया, दर्द-भरा एक अहसास बहने लगा-
      हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू
      हाथ से छूके इस रिश्तों का इलजाम ना दो
      सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो-
मैं चाहकर भी आज खिड़की बंद नहीं कर पाई।
आज शनिवार, सेकंड शनिवार। विनय का ऑफ होता है और मेरा फुलडे वर्किंग डे। विनय का सब काम आराम से करने का दिन। विनय सुबह गार्डन ठीक करते हैं, फिर अखबार और बार-बार चाय। एक बजे लंच। किचन समेट मैं कमरे में आई रेडियो ऑन किया और खिड़की खोली।
पेड़ के नीचे वही लड़का-लड़की आकर बैठे थे। विनय ने मुझे टोका, ''क्या तनु, भरी दोपहरी में खिड़की से गरम लपट आएगी।''
मैं अपनी धुन में थी, बोल पड़ी, ''नहीं विनय, पिछले कुछ दिनों से मैं जब भी ये खिड़की खोलती हूं, एक पॉजिटिव एनर्जी कमरे में आती है। एक ऐसा अहसास जो दोपहर की गर्मी को छांट देते है। और गाने सुनते दोपहर कट जाती है।''
''अच्छा!''विनय मुस्करा उठे। ''तुम औरतें भी ना, पॉजिटिव एनर्जी के रास्ते ढूंढ ही लेती हो, जैसे चाय के प्याले, रेडियो के बोर करते गानों में...''
''आप भी ना...बस हर बात का मजाक बना देते हैं।''
विनय उठकर मेरे पास आ गए। हाथ में चाय का प्याला देखकर बोले, ''अच्छा!तो दफ्तरवालों की तरह घरवालियां भी लंच टाइम में चाय पी लेती हैं। पॉजिटिव एनर्जी वाली।'' विनय भी खिड़की के पास मेरे साथ आ खड़े हुए थे।
''...तनु, देखो, तुम्हारे बैंगनी फूलोंवाले पेड़ के नीचे प्यार की कोंपलें फूटने लगी हैं।'' ये चहककर बोले।
''हां, आजकल यह जोड़ा रोज ही आकर यहां बैठता है।''
''तो पॉजिटिव एनर्जी यहीं से आती है!'' विनय मुस्करा उठे।
मैं खिसिया गई जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो।
''आप भी ना...''
विनय ने मुझे बांहों में समेटते हुए, आंखें मूंदकर कहा, ''सदियों से एक ही लड़का है, एक ही लड़की है, एक ही पेड़ है। दोनों वही मिलते हैं, बस, नाम बदल जाते हैं और फूलों के रंग भी। कहानी वही होती है। किस्से वही होते हैं। पेड़ कभी-कभी गुलमोहर का होता है या बैंगनी फूलोंवाला, क्या फर्क पड़ता है। द एंड सभी का एक-सा ही...''
विनय खिड़की बंद कर लेट गए। पास ही के तकिये पर करवट बदलते हुए मैं महसूस कर रही थी। विनय के अंदर भी यादों का कोई पन्ना खुल गया है शायद। तो क्या, बैंगनी फूलोंवाले पेड़ ने इनके अंदर भी स्मृतियों के विस्मृत होते किसी पन्ने की धूल झाड़ दी ? मेरे आम के पेड़ का राज समझते हुए इन्हें कोई गुलमोहर याद आ गया। रेडियो ऑन किया...शुरू हो रही थी गुलजार साहब की एक नई नज्म :
      मैं कायनात में, सय्यारों से भटकता था
      धुएं में, धूल में उलझी हुई किरण की तरह
      मैं इस जमीं पे भटकता रहा हूं सदियों तक
      गिरा है वक्त से कट के जो लम्हा, उसकी तरह
मैंने उठकर देखा, खिड़की से, जोड़ा चला गया था। शायद कल फिर मिलने का वादा लेकर।
                                             स्वातितिवारी

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

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सोमवार, 15 अप्रैल 2013

  1. स्त्री के इर्द गिर्द
- आनंद वर्धन
हिंदी कहानी संसार में जिन महिला कथाकारों ने इधर लगातार कथा सृजन किया है और जिनकी कहानियाँ सहज रूप में पाठकों को उस दुनिया में ले जाती हैं जिनके वे सक्रिय पात्र हैं, उनमें स्वाति तिवारी का नाम उल्लेखनीय है। जीवन को एक नई दृष्टि से देखती इनकी कहानियाँ उस अदृश्य तार को पकड़ने की कोशिश करती दिखती हैं जो इस उत्तर आधुनिकता की ओर भागते समाज को आज भी उम्मीदों और आस्थाओं से जोड़े हुए है।
‘बैंगनी फूलों वाला पेड’ स्वाति तिवारी का नवीनतम कथा संग्रह है। इससे पहले उनके छः कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘बैंगनी फूलों वाला पेड़’ में कुल २१ कहानियाँ संग्रहित हैं। संग्रह की पहली कहानी जो संग्रह का शीर्षक भी है एक प्रेम कथा है। प्रेम एक शाश्वत सत्य है। वह सृष्टि के आरंभ से आज तक प्रकृति के कण कण में तो व्याप्त है ही, रचनाकारों की कलम से हर विधा में अपनी जगह भी बनाता चला गया है। शायद यह एक ऐसा तत्व या भाव हैं जिसमें अतिव्याप्ति शब्द की कोई जगह नहीं। वह अपनी परिणति पर पहुँचे या न पहुँचे, स्मृतियों में तो रहता ही है। कहानी के पात्र तनु और विनय विस्मृत होते पन्ने की धूल झाड़ते हैं, वह भी दूसरों के बहाने। पाठक ठीक विनय और तनु की तरह खुद को वहाँ खोजने लगता है और विनय का कथन कि ‘‘कहानी वही होती है। किस्से वहीं होते हैं। पेड़ कभी गुलमोहर का होता है या बैंगनी फूलों वाला, क्या फर्क पड़ता है’’ उसे नॉस्टेल्जिक बना देता है।
 ये यथार्थ घटनाएँ हैं जो आम आदमी के जीवन में घटित होती हैं और कथारूप में बदल जाती हैं। बकौल राजेंद्र यादव कि ‘‘कहानी मूलतः यथार्थ का ट्रीटमेंट है, इस यथार्थ को हम कैसे प्रस्तुत करते हैं- एक अनुभव का यथार्थ है, एक वास्तविकता होती है यानी एक जो होता है फैक्चुअल घटना है, जिस तरह से मैं व्यक्तिगत रूप से किसी चीज को देखता हूँ वो मेरा यथार्थ है और उस यथार्थ को हम कई तरह से कह सकते हैं।’’
स्वाति तिवारी की कहानियाँ शहरी मध्यवर्ग के इर्द गिर्द बुनी गई हैं खासकर मध्यवर्गीय स्त्री के इर्द गिर्द। तेजी से बदल रहे समाज में वह स्थितियों से संघर्ष करती स्त्री को विशेष रूप से चित्रित करती हैं। स्त्री का द्वंद स्वाति तिवारी की तमाम कहानियों में दिखता है। इसी संग्रह की कहानी ‘लौट जा पुत्तर’ की माला आधुनिकता और पारिवारिकता के उहापोह में फँसी दिखती है जबकि ‘फैसला’ कहानी की सुभद्रा परिस्थितियों से लड़ते लड़ते अंततः अपनी उम्र से बड़े पुरुष जो उसका बॉस भी है, से विवाह कर लेती हैं, वहीं  ‘निष्कासन’ की निरुपमा जो उच्चाधिकारी है वह पारिवारिक बंधनों में अपने आपको व्यवस्थित और सहज नहीं कर पाती और अंततः तलाक की पहल करती है। इन तीनों कहानियों की नायिकाएँ स्त्री स्वातंत्र्य की पक्षधर तो दिखती हैं लेकिन वे स्त्री स्वातंत्र्य की अतिवादी दृष्टि के कारण प्रतिक्रियावादी हो गई हैं।
स्वाति तिवारी की कहानी के स्त्री चरित्र स्वयं निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं लेकिन बावजूद इसके वे स्त्रियाँ अपने अंतर्द्वंद में भी उलझी हुई हैं। ‘अपने ही कटघरे में‘ की नायिका आशिमा अपने कैरियर के लिये घर छोड़कर दूसरे शहर जाती है पर उसे बार बार घर गृहस्थी से दूर जाना कचोटता है। स्वाति तिवारी की अधिकतर नायिकाएँ शहरी मध्यवर्ग से आती हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद पारिवारिक संस्कारों से मुक्त नहीं है। विद्रोह का स्वर मुखरित करने के बाद भी वे बार बार पारिवारिकता की तलाश में भटकती हैं। उन्हें अपनी ओर से पहल या समझौते करने में कठिनाई का अहसास होता है पर वे समझौता करने को आतुर भी दिखती हैं। शायद आज की मध्यवर्गीय स्त्री इस दोधारी स्थितियों में जीने के लिये विवश हैं। दरअसल मात्र आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाना भर ही स्त्री के लिए पर्याप्त नहीं है। पुरुष सत्ता के सामने आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री भी उसे हर पल जैसे खुश रखने को अभिशापित है। यह उसकी नियति है और यही उसकी परिणति भी।
इस संग्रह की अन्य कहानियाँ भी ध्यान खींचती हैं। ‘ऋतुचक्र’ कहानी की नायिका वसुधा अपने विदेश गए पति की प्रतीक्षा मंे सारे भारतीय संस्कारों का पालन अपनी सास के आदेशानुसार करती जाती है। उसका पति भास्कर अनचाहे विवाह में उससे बंध चुका है और बरसों बाद जब वह लौट कर आता है तो प्रतीक्षातुर वसुधा पाती है कि वह अकेला नहीं है बल्कि उसके साथ एक अन्य स्त्री भी है जिसे उसकी सास आशीर्वाद दे रही हैं। स्त्री का स्त्री के प्रति यह दृष्टिकोण आम भारतीय समाज की तस्वीर प्रस्तुत करता है।
विदेश गए एक अन्य युवक की कहानी है ‘एलिस के देश में।’ यह कहानी विदेश में रहने वाले भारतीयों के संत्रास को बयान करती ऐसी कहानी है जो पैसे के लालच में विदेशों में छोटी मोटी नौकरी करते हैं और अनेक अनचाहे समझौते करते हैं। यह कहानी मानव तस्करी के घिनौने खेल को चिन्हित करने का प्रयास भी करती है।
स्वाति तिवारी की दृष्टि पूरे मध्यवर्गीय समाज के सुखदुख को समेटती है। यथार्थ की भावभूमि पर खड़ी उनकी कहानियाँ उन सारी संेवदनाओं के निकट हैं जिनमें मध्यवर्गीय समाज डूबता उतरता है। वह एक ओर आधुनिकता के मोहपाश में बद्ध होता जा रहा है दूसरी ओर उसकी टँागे परंपरा के बंधन से मुक्त नहीं हो पा रही हैं। ‘प्रायश्चित, आजकल और कोई नहीं‘ ऐसी ही कहानियाँ हैं जो उत्तर आधुनिक होते समाज को चित्रित करती हैं। वहीं ‘अस्तित्व के लिये’ की नायिका अपनी तीसरी संतान को भ्रूण परीक्षण के बाद यह कहकर कि बेटा होने वाला है उसे जन्म देती है पर फिर से मृत बच्ची का जन्म होता है। कहानी का यह संवाद कि ‘बेटे की चाह में जाने अनजाने ही एक हत्यारे समाज को जन्म दे रहे ये लोग‘ एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। आज का समाज बेटे बेटी में विभेद करते हुए उसी पोंगेपन को बढ़ावा दे रहा है जिसके कारण कितनी ही बच्चियाँ जन्म लेने से पूर्व ही काल कवलित कर दी जाती हैं। आज भी हम एक निर्मम समाज में जीने के लिये विवश हैं।
इसी संग्रह की ‘उत्तराधिकारी’ कहानी उच्च वर्गीय शोषण की ओर संकेत करती है पर उसका अंत सकारात्मक सेवा है। एक ऐसा अप्रत्याशित जो अविश्वसनीय सा लगता है। कहानी को यही अप्रत्याशित विशिष्ट बना देता है।
संग्रह की एक अन्य प्रेमकथा है ‘मुट्ठी में बंद चाकलेट’। मनुष्य कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए उसके संवेग और स्मृतियाँ उसे ऊष्मा देते हैं लेकिन इस ऊष्मा के लिये अपनों से  भी झूठ बोलना पड़ता है। शायद संसार के अधिकतर व्यक्तियों की यही स्थिति है। ’फूटी कोठी’ इस संग्रह की अंतिम कथा है जिसमें प्रेम का सारा संसार एक झटके से तोड़कर कथा की मुख्य पात्र माता पिता द्वारा निश्चित किये संबंध से विवाह करने को तैयार हो जाती है। एक और वह खुद को छल रही है दूसरी ओर उसे जिससे वह विवाह करने जा रही हैं। दरअसल यह उचित अनुचित और झूठ सच का ऐसा संसार है जहाँ सब कुछ स्वीकार्य हो चला है। मनुष्य अपने लिये जी रहा ह,ै सोच रहा है और अपनी सुविधानुसार ही सब कुछ पाना चाहता है।
स्वाति तिवारी का यह संग्रह ‘बैंगनी फूलों वाला पेड़’ वास्तव में स्त्री केंद्रित दुनिया के इर्द गिर्द घूमता है जिसमें पुरुष की उपस्थिति तो है लेकिन अधिकतर एक शोषक के रूप में। स्त्री होने के नाते स्त्री मन की गुत्थियों को स्वाति जी ने बहुत निकटता से रूपायित किया है। निश्चय ही उनकी कहानियाँ स्त्री विमर्श के धरातल पर उल्लेखनीय और चर्चा के योग्य हैं।



(आनंद वर्धन)
एफ-५ध्६४ चार इमली
भोपाल



रविवार, 14 अप्रैल 2013

पुस्तक समीक्षा
मानवीय जीवन एवं संबंधों को
परत-दर-परत उधेड़ती कहानियां - गंधर्वगाथा
स्वाति तिवारी

                                :
कुरजा एक अलग रंग अलग ढंग की कहानी है। देश के पिछड़े राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में यह आज भी देखी जा सकती है। कहीं वे कुरजा है कहीं डाकण, कहीं डाईन कही जाती है---कहानी हमारे यहां भी हमारे सामाजिक सरोकारों में विडम्बना की तार-तार सच्चाई को उकेरती है।पुरुष कभी प्रेत घोषित नहीं होता स्त्री डायन करार दे दी जाती है क्यों ?इस क्यों को जानने के लिये कुरजा कहानी से गुजरना होगा |
साहित्य की मानकता मूलतः उनकी घटनाओं, कथानकों, शिल्प, भाषा प्रवाह, समयगत संगतियों-विसंगतियों से परिपूर्ण यथार्थ अनुभव अथवा सामाजिक सरोकारों पर आधारित होती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कहानी मर्म है जीवन का, जो कहने या पढ़ने के साथ श्रोता या पाठक को सीधा उपलब्ध होना चाहिए। उपलब्ध होने  का अर्थ मिलना नहीं है बल्कि यह है कि वह पाठक की भावना को छू जाए। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अच्छी कहानी वह जो पाठक के अन्तस में लम्बे समय तक रची रहे.... यह लम्बा समय घण्टे, दिन, साल और युग भी हो सकता है।
स्त्री कथा या महिला लेखन का नया दौर जो विगत पन्द्रह-बीस सालों में देखा गया वह अपने ढंग की नयी ऊर्जा और मुहावरे वाला है।
इस दृष्टि से अगर चर्चित-युवा कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानियों पर हम बात करते हैं तो सबसे पहले यह कहते हुए मनीषा की कहानियां नए मानक गढ़ती हुई अपने समय की उपलब्धियां कही जा सकती हैं। मनीषा समकालिन महिला कथाकारों में ही ना केवल अग्रणीय हैं बल्कि वे सिद्धहस्त कथाकारों की श्रेणी में अपना एक निर्धारित स्थान स्थापित कर चुकीं हैं क्योंकि उनकी रचनाएं पाठक से लेकर आलोचकों तक गहरे पैठती हैं। मनीषा ने अपने लेखन को मात्र किसी विमर्श के चौखटों में कैद ना करते हुए साहित्यिक आन्दोलनधर्मी स्वरूप में रचते हुए अपनी खास शैली-मुद्रा का निर्माण किया है जो उन्हें एक अलग और विशिष्ठ पहचान देता है।
मनीषा कुलश्रेष्ठ के सामयिक प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित कथा संग्रह ‘गंधर्व-गाथा’ में विविधता, नवीनता, रोचकता के साथ कथ्य-परिवेश, पात्र-चरित्र और अपनी विचारगत विशिष्ठता पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है इन कहानियों की विषयवस्तु, भाषा, पात्र और उनका ट्रीटमेंट लेखिका की बौद्धिक प्रखरता और प्रज्ञा को भी पाठकों तक पहुंचता है।
गंधर्व गाथा संग्रह में ग्यारह कहानियां हैं जिनमें की अंतिम कहानी गंधर्व-गाथा से ही अपनी बात शुरू करती है। यह कहानी यूँ तो प्रेम के चिरपरिचित परिवेश पर रची गई है किन्तु यह एक ऐसी कहानी है जिसमें प्रेम पूरी कहानी में ना दिखाई देता है, ना सुनाई देता पर पूरी कहानी में प्रेम की अनुगुंज महसूस होती है। ‘प्रेम’ पाठक के अंदर स्वतः प्रवाहित होता रहता है अर्थात् पाठक को लगता है यह अपनी कहानी है एक अनुभूत कथा। यह अनकहे प्रेम की एक स्वाभाविक दशा हैं जो प्रेम की सघनता और सम्वेदनशीलता के साथ उतनी ही आत्मीय शैली में रची गयी हैं। कहानी एक झरे हुए पत्ते की तरह गुजरे समय की दोपहर को याद करते हुए शुरू होती हैं जहां उस दोपहर को अलग-अलग उपमाओं से वर्णित करते हुए पाठक के मन में जिज्ञासा अपने चरम पर होती है कि आखिर उस दोपहर ऐसा क्या घटा था। दो परिचित व्यक्ति एक स्त्री और एक पुरूष बरसों बाद एक रिटायरिंग रूम में मिलते हैं और एक बरसों पुरानी दोपहर के पलों-क्षणों को याद करते हैं....और यह महसूस करते हैं कि उस दोपहर के कुछ पलों में उनके बीच अलौकिक प्रेम........हुआ था। ‘प्लेटोनिक लव’ पर केन्द्रित इस खूबसूरत कहानी में भाषा किसी सुंगधित बयार सी प्रवाहित होती है। हर कथा लेखक प्रेम पर अवश्य लिखता हैं पर इस कहानी की अपनी अलग विशिष्टता है। एक गुजरी हुई दोपहर की प्रेम कहानी जिसमें प्रेम का आकर्षण इस हद तक कि वह प्रेतबाधा की तरह लगता है। कहानी में नायक गंधर्व की उपस्थिति सी लगने लगती है।
कहानी ‘खरपतवार’ की शुरूआत थोड़ी सी बोझील है पर जब कहानी लय पकड़ती हैं तो सारे किरदार अपना खाका खिंचते हुए जीवन्त हो उठते हैं तब तक कहानी रीडर-फ्रेण्डली हो जाती है - कहानी का कलेवर दिलचस्प है चरित्र चित्रण लीक से हटकर है- मनीषा के अनुसार नायिका ‘फ्रीक’ हैं --पर सोचने पर मजबूर करती है कि तमाम निंदाई-खुड़ाई करने के बावजूद खरपतवार ना केवल पनपते हैं, लहराते हैं बल्कि वे जाते जाते भी अपने अनचाहे बीज धरती पर छोड़ जाते हैं। जीवन में आने वाले सामाजिक खरपतवार कहानी में अपनी उपस्थिति दर्शाते हैं।
कहानियां अपने युग और परिवेश की पहचान होती है ऐसी कहानियाँ जो आपको कुछ सोचने पर मजबूर करें जो आपकी अंतरात्मा को झकझोर दें। मानवीय जीवन तथा सम्बन्धों को परत-दर-परत उधेड़ती कहानी श्रृंखला में संग्रह की कहानी फाँस को रखा जायगा। यह कहानी भाव-शिल्प और सम्वेदना का अद्भुत समन्वय हैं।
 एक स्त्री होकर इस कहानी को पढ़ना एक अत्यंत पीड़ा दायक सच से गुजरना ही हैं निश्चित ही  एक स्त्री का इसे लिखना भी उतना ही त्रासद रहा होगा - कहानी एक अविवाहित लड़की का उसके पिता द्वारा ही ही बलात्कार किये जाने की घटना पर केन्द्रित है ,इस कहानी के माध्यम से लिखिका ने एक ऐसा दृश्य रेखांकित किया है जो समाज के उस कड़वे सच को उजागर करता है जिसमें एक स्त्री परिवार में ही कैसे प्रताड़ित और शोषित होती है। यह कहानी पारिवारिक या घरेलू हिंसा को केन्द्रीयता प्रदान करती है। बेहद दर्दनाक इस कहानी के साथ जो फ्रांस पाठक के मर्म में धसती है वह बेटी व्दारा पिता की कपाल क्रिया के प्रहार के साथ निकल जाती है। इस कहानी को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है कि मनीषा का रचना संसार बेहद संवेदनशीलता के साथ आस्था के लुप्त होते, विश्वासके बिखरते सूत्रों की बार-बार तलाश करता है। यह कहानी लेखिका को हिन्दी कथा साहित्य की युवा पीढ़ी में बेहद संभावनाशील लेखिका होने के साथ-साथ संवेदनशील कथा शिल्पी के रूप में भी स्थापित करती है। अन्तिमा के रूप में हमारे समाज की वे स्त्रियों जैसी दामिनी, अरूणा शान बाग, हमारे सामने खड़ी हो जाती है।
संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कहानी है ‘बिगडैल बच्चे’हमारे पूर्वाग्रहों को   तोड़ने वाली कहानी है। यह कहानी नयी पीढ़ी की पक्षधरता के साथ हमारे उस भ्रम को तोड़ती है जिसके चलते यह समझ लिया जाता है कि वे फेडेड जींस, हिप्पीकट बाल, चाल या लहजे से श्रृंखल एवं गैर जिम्मेदार या लापरवाह होते हैं --कहानी इस दृष्टिकोण को बदलने में सहायक होती है अंग्रेजी शब्दों को सामान्य रूप से बोलती, अंग्रेजी गानों और गिटार पर थिरकती, बेढंगे कपड़ों ....फैशन का नाम देती। छोटे कपड़े पहनने वाली युवा पीढ़ी के चंद युवा प्रतिनिधि पात्र अचानक रेल में बैठे बहुत से सभ्य सुसंस्कृत लोगों से कहीं अधिक संवेदनशील और  सेवाभावी स्वरूप में सामने आते हैं।जो जीवन मूल्यों को आडम्बरी समाज से एकदम अलग हमारे सामने ले आते है 

 कुरजा स्त्री जीवन के  एक अलग रंग अलग पृष्ठभूमि की कहानी है। देश के पिछड़े राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में यह आज भी देखी जा सकती है। कहीं वे कुरजा है कहीं डाकण, कहीं डाईन कही जाती है---कहानी हमारे यहां भी हमारे सामाजिक सरोकारों में विडम्बना की तार-तार सच्चाई को उकेरती है।आज भी डाकनी कह कर ग्रामीण समाज  में उन स्त्रियों को मार डाला जाता है जो विधवा या परित्यागता होकर पारिवारिक संपत्ति में दखल रखती है ?इसी स्त्रीयों को घरों में ही देह शोषण के बाद डायनकरार देने के भी मामले देखे जाते है |
मनीषा कुलश्रेष्ठ के इस संग्रह की एक और कहानी उन साधारण लोगों की कहानी हैं जो लोक कला को जीवित रखे हैं। वे राजस्थान की रहने वाली है अतः उनकी कहानियों में राजस्थानी परिवेश भी दिखाई देता है वे वहाँ के सांस्कृतिक परिवेश को भी बेहद सुन्दर तरीके से प्रस्तुत करती है --लोक रंग से सजी कहानी स्वांग का गफूरिया एक ऐसा उच्च चरित्र जो दम तोड़ती लोक कलाओं को बचाने के लिए फ्रीक कहे जा सकते हैं गफूरिया जैसे पात्र कहानी के खत्म होने तक हमारे मर्म को पुकारते हैं। प्रशासनिक दुव्यवस्थाएं और एक कलाकार की कैंसर जैसी बीमारी कहानी को मार्मिक बना देती है। मनीषा की विशेषता यह है कि वे एक जागरूक कथाकार है उनकी यही रचनात्मक ऊर्जा कहानी को सशक्त बनाती है।
संग्रह की परजीवी कहानी इस क्रम में थोड़ी कमजोर कहानी है। थोड़ी अस्पष्ट भी है। पुरूष विमर्श की श्रेणी में रखी जाने वाली कहानी है।
अगर मेरा ईश्वर यानी---कहानी का जिक्र ना करूँ तो बात अधूरी रह जाएगी। मनीषा लिखती है कियह लव रूल्स विदाउट रूल्स पर केन्द्रित कहानी है ,मुझे यह संग्रह की सबसे खूबसूरत कहानी लगती है - किसी लड़की की डायरी की याद दिलाती कहानी की नायिका भी ‘फ्रीक’ हैं क्योंकि वो बिंदास नाचती है गाती है फैशन करती है --अपना जीवन अपनी तरह जीना चाहती है------पर कहानी में जो जिद लड़की को फ्रीक यानी सनकी दिखाती है वह जिद पाठक को अहसास करवाती है कि संग्रह में एक मात्र यही पात्र फ्रीक नहीं है। एक आम लड़की जो सब लड़कियों में शामिल है या उनका प्रतिनिधित्व करती है। यह कहानी आरंभ से अन्त तक हिस्सों में बँटती हैपर कथा के सूत्र विभाजित नहीं होते वे अपने प्रवाह में सतत जुड़े रहते है कहानी की यही विशेषताहै कि -हर पात्र क्रमशः अपने आप में फ्रीक--लगता है,पर होता नहीं है यही वजह है जिससे कहानी अपनी शिष्टता को नहीं खोती। बोल्ड कहा जाने वाला विषय भी अपने सौन्दर्य को बचाए रखता है ----और पाठक प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाता।
कालिन्दी भी एक उल्लेख करने योग्य कहानी है। रेड लाइट एरिया में रहने वाली एक न्यूड मॉडल की कहानी है --संवेदना की दृष्टि से मन को छू लेती है।
इस तरह ग्यारह कहानियों के ये फंतासी और यथार्थ के बीच जीते थे सहज सरल होकर भी फ्रीकी लगने वाले पात्र पाठक को बहुत करीबी लगने लगते हैं।
सच यही है कि .....चरित्रों से ही कहानियाँ बनती हैं लेखिका की रचनात्मक इन पात्रों के सुक्ष्म भाव पकड़ने में कामयाब होती है।
आधुनिक समाज के अन्तसंघर्षों तथा द्वंद्वों से जूझते मनीषा की कहानियों के पात्र तमाम व्यवस्थाओं के खिलाफ विचार जगाते हैं।
एक नए तेवर, चिंतन और दृष्टि से चित्रित इन कहानियों में करूणा, प्रेम की कदात्त एवं पावन भावना, व्यवस्थाओं के राव पेंज, मनुष्य की पीड़ा, स्थापित मान्यताओं को तोड़ती वैचारिक दृष्टि रेखांकित होती है।
गंधर्व गाथा के माध्यम से रखें तो स्त्री लेखन को उसके गहरे सामाजिक सरोकारों से काट कर ना तो पढ़ा जा सकता है ना लिखा जा सकता है। लेखक खाँचों में नहीं बाँटा जा सकता क्योंकि हर लेखक अपने समय, समाज में विच्छन होकर नहीं लिखता। महिला कथाकार भी समाज के बाहर-भीतर से ही अनुभूत होती है अतः उनका लेखन भी बेहतर समाज रचना के सरोकारों से जुड़ा है। उसके सरोकार भी उतने ही गहरे होते हैं जितने किसी भी सक्षम साहित्यकार के होना चाहिए। गंधर्व गाथा चिरंतन सवालों और और वैचारिकता के साथ पाठक के मर्म को छू लेने वाली कहानियों का संग्रह है। मनीषा का भारतीय और ग्रीक मिथकों का समन्वय नयापन देता है। भाषा को प्रवाह ताजगी भरा व देशस्थ शब्दों से समृद्ध है।
    कहानी संग्रह की ‘‘एडोनस का रक्त और लिलि के फूल’’ एक घायल सैनिक की कहानी ‘बहुत अच्छी कहानी है.. एक नए कथानक पर लिखी गई कहानी जिसमें एक घायल सैनिक की सेवा में जुटी नर्स और उसके मंगेतर का एक उज्ज्वल चरित्र हमारे सामने आता है। बेहद संवेदनशील कहानी। एक नया विषय और एक वैचारिक पावनता से भरा घटनाक्रम। एक ऐसी कहानी जो पाठक पर स्थायी असर छोड़ती है।
मनीषा के कई संग्रह एवं दो उपन्यास आ चुके हैं -- यह संग्रह भी साहित्य के नए आयाम तलाशेगा।
पुस्तक        -    गंधर्वगाथा
प्रकाशक    -    सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य        -

स्वाति तिवारी
ईएन-1/9 चार इमली
भोपाल (म.प्र.)


शनिवार, 13 अप्रैल 2013

पुस्तक समीक्षा
विश्व की भीषणतम औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी का पीड़ाजनित दस्तावेज है





भोपाल गैस कांड में पीड़ित महिलाओं के दर्द को परत-दर-परत उतारती यह पुस्तक उस त्रासदी के बारे में कही अनकही को कुछ इस तरह सुनाती है कि पाठक दुर्घटना को पढने के साथ साथ देख भी रहा होता है। दर्द का एक तीखा नश्तर चुभने लगता है। जिसके त्रासदी से जुड़े सामाजिक, राजनैतिक, मानवीय और मनोवैज्ञानिक मुद्दे उभरकर सामने आते हैं।


उद्योग मानव सभ्यता में एक ऐसा अनिवार्य अप्रा.तिक निर्माण है जिससे मानव सभ्यता का विकास होता है। आज चारों तरफ उद्योगों की भरमार है। सभ्यता के इस निर्माण में मनुष्य खुद ही घिर गया है। हर शहर गावं कस्बा खेत और जंगल हमें इनकी इकाइयों से भरे दिखते हैं। कहीं काला धुंआ छोड़ती चिमनी है तो कहीं जहरीला पानी छोड़ता कोई कारखाना। कभी नगर और गांव नदियों के किनारे बनते थे लेकिन आज ये कारखानों के आसपास बनने लगे हैं। क्योंकि मानव सभ्यता ने प्र.ति नहीं पैसे की ताकत से पनपने का गुण सीख लिया है। इसलिए यह त्रासदी या इस जैसी सभी त्रासदियां मानव सभ्यता को चेतावनी हैं कि वे जीवन से ऐसा खिलवाड़ न करें। वास्तव में भोपाल त्रासदी के बाद बहुत वक्त गुजर गया है। मानव विकास ने भी इन दुर्घटनाओं से बहुत कुछ सीखने की कोशिश की है। लेकिन अभी भी हम नहीं कह सकते हैं कि मानव समाज पर कोई खतरा कम हुआ है। उदाहरण के लिए कुछ साल पहले ही जापान के परमाणु घरों के विस्फोट और फिर विकरण की डरावनी तस्वीर और रिपोर्टिंग किसे याद नहीं होगी।
इन्हीं कुछ सवालों को मिला कर भोपाल गैस त्रासदी पर स्वाति तिवारी ने एक किताब लिखी है सवाल आज भी जिंदा हैं। औद्यागिक त्रासदियों को लेकर इस किताब में जो सवाल उठाए हैं वे आज जिंदा ही नहीं हैं, समाज और सभ्यता को प्रभावित कर रहे हैं। प्रताड़ित कर रहे हैं। एक औद्यागिक त्रासदी केवल एक पक्ष को नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि उसके घातक परिणाम कई स्तरों पर समाज को प्रभावित करते हैँ और नुकसान पहुंचाते हैं।वे दूरगामी भाी होते हैं। मध्यप्रदेश की राजनधानी भोपाल में घटित 27 साल पहले घटित इस दुर्घटना ने भोपाल के समाज को आज भी प्रभावित करने के लक्षणों को जीवित बनाए रखा है। स्वाति तिवारी की पुस्तक में महिलाओं को केंद्रित किया गया है।
पर सवाल आज भी जिन्दा है? पुस्तक में से डॉ. स्वाति तिवारी
एक सवाल करती हैं कि हम कैसे भूल जाएं कि भोपाल में एक कारखाना चाकलेट बनाने वाले संयंत्र की तर्ज पर जहर बनाता रहा है। यह पुस्तक याद दिलाने की कोशिश करती है। यह 27 साल पहले घटी उस दुर्घटना की याद है जिसके लिए याद रखना सबक लेने के लिए जरूरी है और यह भूलने के खिलाफ एक याद रखने की लड़ाई है।
पुस्तक स्त्री विमर्श की धार पर रखकर उसकी सूक्ष्म विवेचना करती है कि कोई भी विभीषिका त्रासदी तभी बनती है, जब हम उससे सबक नहीं सीखते। यह त्रासदी ना केवल भोपाल में बल्कि विश्व में कई जगह एक साथ हर पल घट रही है। क्योंकि कोई भी घटना अचानक न घटकर वह क्रमिक रूप से उस परिणति तक पहुंचती है जब हम उसे दुर्घटना कहते हैं।
यह किताब विश्व की भीषणतम औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी का पीड़ाजनित दस्तावेज है एक मनोवैज्ञानिक दस्तावेज जो 27 साल होने के बावजूद न्याय की तारीख का इन्तजार करती औरतों की पीड़ा को एक तार्किक दस्तावेज में बदलती है।
भोपाल गैस कांड में पीड़ित महिलाओं के दर्द को परत-दर-परत उतारती यह पुस्तक उस त्रासदी के बारे में कही अनकही को कुछ इस तरह सुनाती है कि पाठक दुर्घटना को पढने के साथ साथ देख भी रहा होता है। दर्द का एक तीखा नश्तर चुभने लगता है। जिसके त्रासदी से जुड़े सामाजिक, राजनैतिक, मानवीय और मनोवैज्ञानिक मुद्दे उभरकर सामने आते हैं।
यह किताब अपने आप में एक ऐसा बहुमूल्य दस्तावेज है जो गैस पीड़ितों के इतिहास को, उनके सामाजिक सरोकारों को, उनकी पीड़ाओं को उनकी समस्याओं को उनके सवालों के माध्यम से नई दिशा और नए आयाम देती है।

इस किताब में वे औरतें भी शामिल हैं जो हादसे से आहत होने के बाद भी जीवित हैं जो हाशिए पर हैं। यह दस्तावेज केबल आंकड़ों और रिपोर्टंग की मिलीजुली प्रस्तुति नहीं है। यह मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय अध्ययन की तरह है जो सोचने पर मजबूर करता है कि उद्योगों को विकास का आधार मानने के बावजूद हमें सोचना होगा कि उद्योगों का रखरखाव और उनमें कार्यरत श्रमिकों के जीवन रक्षक प्रबंधों का स्तर कितना और कैसा है? पुस्तक तमाम सवालों में एक सवाल यह भी रखती है कि हम अब तक नहीं जानते हैं कि मिक की तरह ऐसे कितने रसायन हैं जिनका एन्टीडोज हमारे पास उपलब्ध नहीं है। त्रासदी के पहले शिकार मोहम्मद अशरफ की मौत यह सवाल उठाती है कि ऐसे लोगों के परिवारों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा कितनी है? साजिदा बानो के रूप में पुस्तक में वे सभी मजदूर परिवार और उनकी औरतें हैं जो जोखिम वाले उद्योगों में काम करते हैं।
यह पुस्तक भोपाल त्रासदी से उपजी मानवीय तकलीफों में स्त्री की भागीदारी का भी दस्तावेज है। 250 पृष्ठों और छह् खण्डों में बंटी इस पुस्तक का जो बिन्दु सबसे अधिक ध्यानाकर्षित करता है उसके अनुसार वैज्ञानिक जांचों में सामने आए तथ्यों में यह स्पष्ट संकेत है कि गैस के असर से कैंसर की आशंकाएं पनपीं और गर्भस्थ भ्रूणों पर दुष्प्रभाव पड़े। गर्भवती स्त्रियों के मानवाधिकारों का हनन हुआ। औरतों के प्रजनन तन्त्र प्रभावित हुए। कई औरतें मातृत्व धारण नहीं कर पायीं। औरतों को बांझ बनाने वाली इस घटना के बावजूद 27 वर्षों र्में र्महिला स्वास्थ्य पर केंद्रित कोई महत्वपूर्ण रिसर्च का ना होना, हमारी व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करता है।
किताब उन लोगों से मिल कर रची है जो इस त्रासदी के बाद प्रभावित अपने शरीर को केवल ढो पा रहे हैं। ये वे लोग हैं जो बरसों पहले   जीते जी मर गए थे। बीमारियों से लड़ते-लड़ते, दुखदर्द सहते-सहते, अपनों के गम में तील मरते लोग.... इन पीड़ितों की आत्मा का हाहाकार और आक्रोश जीवन के संघर्षों र्में र्ऊपर से भले ही शान्त लगता हो पर उनकी ठण्डी बेजान परतों के नीचे पीड़ा का अथाह समन्दर हिचकोले खाता लहरा रहा है। देखने सुनने वालों को लगता है कि भोपाल गैस काण्ड में मरते-मिटते लोगों की कहानी इतिहास के नेपथ्य में चली गई है पर यह पुस्तक उसके पीछे की कथा कहती है- उन पीड़ित बाशिन्दों की बेबसी और लड़ने की जीने की जीजिविषा की गाथा है। जिस गाथा का हर पन्ना हमें ना केवल बेचैन करता है बल्कि रुला देते हैं।
यह पुस्तक कहानीकार स्वाति का एक नया रूप सामने लाती है अति संवेदनशील सामाजिक सरोकारों की लेखक।  वास्तव में इस पुस्तक में जो कुछ दर्ज है वह आने वाले समय में त्रासदी की भयावहता को सुरक्षा के अहसास और जिम्मेदारी को कामय रखेगी। उन सवालों को जिन्दा रखेगी जो अनुत्तरित ही रह गए हैं। विधवा कॉलोनी भोपाल में है एक गाली जैसी गली जो विगत 27 सालों से इसी नाम से पहचानी जाती रही। स्वाति समाज से व्यवस्थाओं से पूछना चाहती है कि यह औरतों का स्थापन था या विस्थापन। वे चम्पादेवी शुक्ला से मिली उनके साथ कई घण्टे चर्चा की। वे साधना कर्णिक से मिली। वे कभी मौत के खण्डहरों में घुमी तो कभी विधवा कॉलोनी, नीलम पार्क, यादगारे शाहजहानी पार्क की बैठकों में गई अपनी डायरी और अपने कैमरे के साथ। किताब के आखिरी के 20 पन्ने जिनमें औरतों के तब से लेकर आज तक के हालात फैले हैं जिनके लिए लेखक ने लिखा जहां शब्द शून्य है। जब त्रासदी को मानव मन और मानव संसाधन संभाल नहीं पाते तो वह संज्ञाशून्य हो जाता है। यही कारण है कि इतने समय बीतने के साथ इस त्रासदी के कई अनुछुए पहलुओं को स्वाति तिवारी द्वारा उठाया जा सका है।
पुस्तक में विधवा कॉलोनी के खुले आंगन में एक अदालत लगती है जहां गुंगी बहरी एक बच्ची जो हादसे के शिकार माता-पिता की सन्तान है वह गुहार लगाती है कि मुजरिम हाजिर हो। यह अध्याय आक्रोश और पीड़ा के उत्पीड़न के लावे से भरा हुआ है। इसमें सत्ताइस साल के मानसिक सन्तापों का शब्दशह् आक्रोशित विलाप करती तीन पीढ़ियों के दर्द व गुस्से का लावा स्तब्ध कर देता है। इस खुली अदालत में पीड़ित औरते ही वकील हैं, वे ही जज हैं और भुगतभोगी तो वे हैं ही।
पुस्तक में व्यवस्थाओं से तमाम सवाल किए गए हैं- जिनका अर्थ है कि मुजरिम कौन है आखिर? अन्तहीन दर्दनाक कहानियों को भोपाल में किसने रचा?

पुस्तक - सवाल आज भी जिन्दा है?
लेखक - डॉ. स्वाति तिवारी
मूल्य - 495 रुपये
प्रकाशक - सामयिक प्रकाशन, दिल्ली।

रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति

टॉ
प 12  हईलईफ कॉप्लेक्स चर्च रोड जहांगीराबाद भोपाल