पुस्तक समीक्षा
मानवीय जीवन एवं संबंधों को
परत-दर-परत उधेड़ती कहानियां - गंधर्वगाथा
स्वाति तिवारी
:
कुरजा एक अलग रंग अलग ढंग की कहानी है। देश के पिछड़े राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में यह आज भी देखी जा सकती है। कहीं वे कुरजा है कहीं डाकण, कहीं डाईन कही जाती है---कहानी हमारे यहां भी हमारे सामाजिक सरोकारों में विडम्बना की तार-तार सच्चाई को उकेरती है।पुरुष कभी प्रेत घोषित नहीं होता स्त्री डायन करार दे दी जाती है क्यों ?इस क्यों को जानने के लिये कुरजा कहानी से गुजरना होगा |
साहित्य की मानकता मूलतः उनकी घटनाओं, कथानकों, शिल्प, भाषा प्रवाह, समयगत संगतियों-विसंगतियों से परिपूर्ण यथार्थ अनुभव अथवा सामाजिक सरोकारों पर आधारित होती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कहानी मर्म है जीवन का, जो कहने या पढ़ने के साथ श्रोता या पाठक को सीधा उपलब्ध होना चाहिए। उपलब्ध होने का अर्थ मिलना नहीं है बल्कि यह है कि वह पाठक की भावना को छू जाए। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अच्छी कहानी वह जो पाठक के अन्तस में लम्बे समय तक रची रहे.... यह लम्बा समय घण्टे, दिन, साल और युग भी हो सकता है।
स्त्री कथा या महिला लेखन का नया दौर जो विगत पन्द्रह-बीस सालों में देखा गया वह अपने ढंग की नयी ऊर्जा और मुहावरे वाला है।
इस दृष्टि से अगर चर्चित-युवा कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानियों पर हम बात करते हैं तो सबसे पहले यह कहते हुए मनीषा की कहानियां नए मानक गढ़ती हुई अपने समय की उपलब्धियां कही जा सकती हैं। मनीषा समकालिन महिला कथाकारों में ही ना केवल अग्रणीय हैं बल्कि वे सिद्धहस्त कथाकारों की श्रेणी में अपना एक निर्धारित स्थान स्थापित कर चुकीं हैं क्योंकि उनकी रचनाएं पाठक से लेकर आलोचकों तक गहरे पैठती हैं। मनीषा ने अपने लेखन को मात्र किसी विमर्श के चौखटों में कैद ना करते हुए साहित्यिक आन्दोलनधर्मी स्वरूप में रचते हुए अपनी खास शैली-मुद्रा का निर्माण किया है जो उन्हें एक अलग और विशिष्ठ पहचान देता है।
मनीषा कुलश्रेष्ठ के सामयिक प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित कथा संग्रह ‘गंधर्व-गाथा’ में विविधता, नवीनता, रोचकता के साथ कथ्य-परिवेश, पात्र-चरित्र और अपनी विचारगत विशिष्ठता पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है इन कहानियों की विषयवस्तु, भाषा, पात्र और उनका ट्रीटमेंट लेखिका की बौद्धिक प्रखरता और प्रज्ञा को भी पाठकों तक पहुंचता है।
गंधर्व गाथा संग्रह में ग्यारह कहानियां हैं जिनमें की अंतिम कहानी गंधर्व-गाथा से ही अपनी बात शुरू करती है। यह कहानी यूँ तो प्रेम के चिरपरिचित परिवेश पर रची गई है किन्तु यह एक ऐसी कहानी है जिसमें प्रेम पूरी कहानी में ना दिखाई देता है, ना सुनाई देता पर पूरी कहानी में प्रेम की अनुगुंज महसूस होती है। ‘प्रेम’ पाठक के अंदर स्वतः प्रवाहित होता रहता है अर्थात् पाठक को लगता है यह अपनी कहानी है एक अनुभूत कथा। यह अनकहे प्रेम की एक स्वाभाविक दशा हैं जो प्रेम की सघनता और सम्वेदनशीलता के साथ उतनी ही आत्मीय शैली में रची गयी हैं। कहानी एक झरे हुए पत्ते की तरह गुजरे समय की दोपहर को याद करते हुए शुरू होती हैं जहां उस दोपहर को अलग-अलग उपमाओं से वर्णित करते हुए पाठक के मन में जिज्ञासा अपने चरम पर होती है कि आखिर उस दोपहर ऐसा क्या घटा था। दो परिचित व्यक्ति एक स्त्री और एक पुरूष बरसों बाद एक रिटायरिंग रूम में मिलते हैं और एक बरसों पुरानी दोपहर के पलों-क्षणों को याद करते हैं....और यह महसूस करते हैं कि उस दोपहर के कुछ पलों में उनके बीच अलौकिक प्रेम........हुआ था। ‘प्लेटोनिक लव’ पर केन्द्रित इस खूबसूरत कहानी में भाषा किसी सुंगधित बयार सी प्रवाहित होती है। हर कथा लेखक प्रेम पर अवश्य लिखता हैं पर इस कहानी की अपनी अलग विशिष्टता है। एक गुजरी हुई दोपहर की प्रेम कहानी जिसमें प्रेम का आकर्षण इस हद तक कि वह प्रेतबाधा की तरह लगता है। कहानी में नायक गंधर्व की उपस्थिति सी लगने लगती है।
कहानी ‘खरपतवार’ की शुरूआत थोड़ी सी बोझील है पर जब कहानी लय पकड़ती हैं तो सारे किरदार अपना खाका खिंचते हुए जीवन्त हो उठते हैं तब तक कहानी रीडर-फ्रेण्डली हो जाती है - कहानी का कलेवर दिलचस्प है चरित्र चित्रण लीक से हटकर है- मनीषा के अनुसार नायिका ‘फ्रीक’ हैं --पर सोचने पर मजबूर करती है कि तमाम निंदाई-खुड़ाई करने के बावजूद खरपतवार ना केवल पनपते हैं, लहराते हैं बल्कि वे जाते जाते भी अपने अनचाहे बीज धरती पर छोड़ जाते हैं। जीवन में आने वाले सामाजिक खरपतवार कहानी में अपनी उपस्थिति दर्शाते हैं।
कहानियां अपने युग और परिवेश की पहचान होती है ऐसी कहानियाँ जो आपको कुछ सोचने पर मजबूर करें जो आपकी अंतरात्मा को झकझोर दें। मानवीय जीवन तथा सम्बन्धों को परत-दर-परत उधेड़ती कहानी श्रृंखला में संग्रह की कहानी फाँस को रखा जायगा। यह कहानी भाव-शिल्प और सम्वेदना का अद्भुत समन्वय हैं।
एक स्त्री होकर इस कहानी को पढ़ना एक अत्यंत पीड़ा दायक सच से गुजरना ही हैं निश्चित ही एक स्त्री का इसे लिखना भी उतना ही त्रासद रहा होगा - कहानी एक अविवाहित लड़की का उसके पिता द्वारा ही ही बलात्कार किये जाने की घटना पर केन्द्रित है ,इस कहानी के माध्यम से लिखिका ने एक ऐसा दृश्य रेखांकित किया है जो समाज के उस कड़वे सच को उजागर करता है जिसमें एक स्त्री परिवार में ही कैसे प्रताड़ित और शोषित होती है। यह कहानी पारिवारिक या घरेलू हिंसा को केन्द्रीयता प्रदान करती है। बेहद दर्दनाक इस कहानी के साथ जो फ्रांस पाठक के मर्म में धसती है वह बेटी व्दारा पिता की कपाल क्रिया के प्रहार के साथ निकल जाती है। इस कहानी को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है कि मनीषा का रचना संसार बेहद संवेदनशीलता के साथ आस्था के लुप्त होते, विश्वासके बिखरते सूत्रों की बार-बार तलाश करता है। यह कहानी लेखिका को हिन्दी कथा साहित्य की युवा पीढ़ी में बेहद संभावनाशील लेखिका होने के साथ-साथ संवेदनशील कथा शिल्पी के रूप में भी स्थापित करती है। अन्तिमा के रूप में हमारे समाज की वे स्त्रियों जैसी दामिनी, अरूणा शान बाग, हमारे सामने खड़ी हो जाती है।
संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कहानी है ‘बिगडैल बच्चे’हमारे पूर्वाग्रहों को तोड़ने वाली कहानी है। यह कहानी नयी पीढ़ी की पक्षधरता के साथ हमारे उस भ्रम को तोड़ती है जिसके चलते यह समझ लिया जाता है कि वे फेडेड जींस, हिप्पीकट बाल, चाल या लहजे से श्रृंखल एवं गैर जिम्मेदार या लापरवाह होते हैं --कहानी इस दृष्टिकोण को बदलने में सहायक होती है अंग्रेजी शब्दों को सामान्य रूप से बोलती, अंग्रेजी गानों और गिटार पर थिरकती, बेढंगे कपड़ों ....फैशन का नाम देती। छोटे कपड़े पहनने वाली युवा पीढ़ी के चंद युवा प्रतिनिधि पात्र अचानक रेल में बैठे बहुत से सभ्य सुसंस्कृत लोगों से कहीं अधिक संवेदनशील और सेवाभावी स्वरूप में सामने आते हैं।जो जीवन मूल्यों को आडम्बरी समाज से एकदम अलग हमारे सामने ले आते है
कुरजा स्त्री जीवन के एक अलग रंग अलग पृष्ठभूमि की कहानी है। देश के पिछड़े राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में यह आज भी देखी जा सकती है। कहीं वे कुरजा है कहीं डाकण, कहीं डाईन कही जाती है---कहानी हमारे यहां भी हमारे सामाजिक सरोकारों में विडम्बना की तार-तार सच्चाई को उकेरती है।आज भी डाकनी कह कर ग्रामीण समाज में उन स्त्रियों को मार डाला जाता है जो विधवा या परित्यागता होकर पारिवारिक संपत्ति में दखल रखती है ?इसी स्त्रीयों को घरों में ही देह शोषण के बाद डायनकरार देने के भी मामले देखे जाते है |
मनीषा कुलश्रेष्ठ के इस संग्रह की एक और कहानी उन साधारण लोगों की कहानी हैं जो लोक कला को जीवित रखे हैं। वे राजस्थान की रहने वाली है अतः उनकी कहानियों में राजस्थानी परिवेश भी दिखाई देता है वे वहाँ के सांस्कृतिक परिवेश को भी बेहद सुन्दर तरीके से प्रस्तुत करती है --लोक रंग से सजी कहानी स्वांग का गफूरिया एक ऐसा उच्च चरित्र जो दम तोड़ती लोक कलाओं को बचाने के लिए फ्रीक कहे जा सकते हैं गफूरिया जैसे पात्र कहानी के खत्म होने तक हमारे मर्म को पुकारते हैं। प्रशासनिक दुव्यवस्थाएं और एक कलाकार की कैंसर जैसी बीमारी कहानी को मार्मिक बना देती है। मनीषा की विशेषता यह है कि वे एक जागरूक कथाकार है उनकी यही रचनात्मक ऊर्जा कहानी को सशक्त बनाती है।
संग्रह की परजीवी कहानी इस क्रम में थोड़ी कमजोर कहानी है। थोड़ी अस्पष्ट भी है। पुरूष विमर्श की श्रेणी में रखी जाने वाली कहानी है।
अगर मेरा ईश्वर यानी---कहानी का जिक्र ना करूँ तो बात अधूरी रह जाएगी। मनीषा लिखती है कियह लव रूल्स विदाउट रूल्स पर केन्द्रित कहानी है ,मुझे यह संग्रह की सबसे खूबसूरत कहानी लगती है - किसी लड़की की डायरी की याद दिलाती कहानी की नायिका भी ‘फ्रीक’ हैं क्योंकि वो बिंदास नाचती है गाती है फैशन करती है --अपना जीवन अपनी तरह जीना चाहती है------पर कहानी में जो जिद लड़की को फ्रीक यानी सनकी दिखाती है वह जिद पाठक को अहसास करवाती है कि संग्रह में एक मात्र यही पात्र फ्रीक नहीं है। एक आम लड़की जो सब लड़कियों में शामिल है या उनका प्रतिनिधित्व करती है। यह कहानी आरंभ से अन्त तक हिस्सों में बँटती हैपर कथा के सूत्र विभाजित नहीं होते वे अपने प्रवाह में सतत जुड़े रहते है कहानी की यही विशेषताहै कि -हर पात्र क्रमशः अपने आप में फ्रीक--लगता है,पर होता नहीं है यही वजह है जिससे कहानी अपनी शिष्टता को नहीं खोती। बोल्ड कहा जाने वाला विषय भी अपने सौन्दर्य को बचाए रखता है ----और पाठक प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाता।
कालिन्दी भी एक उल्लेख करने योग्य कहानी है। रेड लाइट एरिया में रहने वाली एक न्यूड मॉडल की कहानी है --संवेदना की दृष्टि से मन को छू लेती है।
इस तरह ग्यारह कहानियों के ये फंतासी और यथार्थ के बीच जीते थे सहज सरल होकर भी फ्रीकी लगने वाले पात्र पाठक को बहुत करीबी लगने लगते हैं।
सच यही है कि .....चरित्रों से ही कहानियाँ बनती हैं लेखिका की रचनात्मक इन पात्रों के सुक्ष्म भाव पकड़ने में कामयाब होती है।
आधुनिक समाज के अन्तसंघर्षों तथा द्वंद्वों से जूझते मनीषा की कहानियों के पात्र तमाम व्यवस्थाओं के खिलाफ विचार जगाते हैं।
एक नए तेवर, चिंतन और दृष्टि से चित्रित इन कहानियों में करूणा, प्रेम की कदात्त एवं पावन भावना, व्यवस्थाओं के राव पेंज, मनुष्य की पीड़ा, स्थापित मान्यताओं को तोड़ती वैचारिक दृष्टि रेखांकित होती है।
गंधर्व गाथा के माध्यम से रखें तो स्त्री लेखन को उसके गहरे सामाजिक सरोकारों से काट कर ना तो पढ़ा जा सकता है ना लिखा जा सकता है। लेखक खाँचों में नहीं बाँटा जा सकता क्योंकि हर लेखक अपने समय, समाज में विच्छन होकर नहीं लिखता। महिला कथाकार भी समाज के बाहर-भीतर से ही अनुभूत होती है अतः उनका लेखन भी बेहतर समाज रचना के सरोकारों से जुड़ा है। उसके सरोकार भी उतने ही गहरे होते हैं जितने किसी भी सक्षम साहित्यकार के होना चाहिए। गंधर्व गाथा चिरंतन सवालों और और वैचारिकता के साथ पाठक के मर्म को छू लेने वाली कहानियों का संग्रह है। मनीषा का भारतीय और ग्रीक मिथकों का समन्वय नयापन देता है। भाषा को प्रवाह ताजगी भरा व देशस्थ शब्दों से समृद्ध है।
कहानी संग्रह की ‘‘एडोनस का रक्त और लिलि के फूल’’ एक घायल सैनिक की कहानी ‘बहुत अच्छी कहानी है.. एक नए कथानक पर लिखी गई कहानी जिसमें एक घायल सैनिक की सेवा में जुटी नर्स और उसके मंगेतर का एक उज्ज्वल चरित्र हमारे सामने आता है। बेहद संवेदनशील कहानी। एक नया विषय और एक वैचारिक पावनता से भरा घटनाक्रम। एक ऐसी कहानी जो पाठक पर स्थायी असर छोड़ती है।
मनीषा के कई संग्रह एवं दो उपन्यास आ चुके हैं -- यह संग्रह भी साहित्य के नए आयाम तलाशेगा।
पुस्तक - गंधर्वगाथा
प्रकाशक - सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य -
स्वाति तिवारी
ईएन-1/9 चार इमली
भोपाल (म.प्र.)
मानवीय जीवन एवं संबंधों को
परत-दर-परत उधेड़ती कहानियां - गंधर्वगाथा
स्वाति तिवारी
:
कुरजा एक अलग रंग अलग ढंग की कहानी है। देश के पिछड़े राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में यह आज भी देखी जा सकती है। कहीं वे कुरजा है कहीं डाकण, कहीं डाईन कही जाती है---कहानी हमारे यहां भी हमारे सामाजिक सरोकारों में विडम्बना की तार-तार सच्चाई को उकेरती है।पुरुष कभी प्रेत घोषित नहीं होता स्त्री डायन करार दे दी जाती है क्यों ?इस क्यों को जानने के लिये कुरजा कहानी से गुजरना होगा |
साहित्य की मानकता मूलतः उनकी घटनाओं, कथानकों, शिल्प, भाषा प्रवाह, समयगत संगतियों-विसंगतियों से परिपूर्ण यथार्थ अनुभव अथवा सामाजिक सरोकारों पर आधारित होती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कहानी मर्म है जीवन का, जो कहने या पढ़ने के साथ श्रोता या पाठक को सीधा उपलब्ध होना चाहिए। उपलब्ध होने का अर्थ मिलना नहीं है बल्कि यह है कि वह पाठक की भावना को छू जाए। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अच्छी कहानी वह जो पाठक के अन्तस में लम्बे समय तक रची रहे.... यह लम्बा समय घण्टे, दिन, साल और युग भी हो सकता है।
स्त्री कथा या महिला लेखन का नया दौर जो विगत पन्द्रह-बीस सालों में देखा गया वह अपने ढंग की नयी ऊर्जा और मुहावरे वाला है।
इस दृष्टि से अगर चर्चित-युवा कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानियों पर हम बात करते हैं तो सबसे पहले यह कहते हुए मनीषा की कहानियां नए मानक गढ़ती हुई अपने समय की उपलब्धियां कही जा सकती हैं। मनीषा समकालिन महिला कथाकारों में ही ना केवल अग्रणीय हैं बल्कि वे सिद्धहस्त कथाकारों की श्रेणी में अपना एक निर्धारित स्थान स्थापित कर चुकीं हैं क्योंकि उनकी रचनाएं पाठक से लेकर आलोचकों तक गहरे पैठती हैं। मनीषा ने अपने लेखन को मात्र किसी विमर्श के चौखटों में कैद ना करते हुए साहित्यिक आन्दोलनधर्मी स्वरूप में रचते हुए अपनी खास शैली-मुद्रा का निर्माण किया है जो उन्हें एक अलग और विशिष्ठ पहचान देता है।
मनीषा कुलश्रेष्ठ के सामयिक प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित कथा संग्रह ‘गंधर्व-गाथा’ में विविधता, नवीनता, रोचकता के साथ कथ्य-परिवेश, पात्र-चरित्र और अपनी विचारगत विशिष्ठता पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है इन कहानियों की विषयवस्तु, भाषा, पात्र और उनका ट्रीटमेंट लेखिका की बौद्धिक प्रखरता और प्रज्ञा को भी पाठकों तक पहुंचता है।
गंधर्व गाथा संग्रह में ग्यारह कहानियां हैं जिनमें की अंतिम कहानी गंधर्व-गाथा से ही अपनी बात शुरू करती है। यह कहानी यूँ तो प्रेम के चिरपरिचित परिवेश पर रची गई है किन्तु यह एक ऐसी कहानी है जिसमें प्रेम पूरी कहानी में ना दिखाई देता है, ना सुनाई देता पर पूरी कहानी में प्रेम की अनुगुंज महसूस होती है। ‘प्रेम’ पाठक के अंदर स्वतः प्रवाहित होता रहता है अर्थात् पाठक को लगता है यह अपनी कहानी है एक अनुभूत कथा। यह अनकहे प्रेम की एक स्वाभाविक दशा हैं जो प्रेम की सघनता और सम्वेदनशीलता के साथ उतनी ही आत्मीय शैली में रची गयी हैं। कहानी एक झरे हुए पत्ते की तरह गुजरे समय की दोपहर को याद करते हुए शुरू होती हैं जहां उस दोपहर को अलग-अलग उपमाओं से वर्णित करते हुए पाठक के मन में जिज्ञासा अपने चरम पर होती है कि आखिर उस दोपहर ऐसा क्या घटा था। दो परिचित व्यक्ति एक स्त्री और एक पुरूष बरसों बाद एक रिटायरिंग रूम में मिलते हैं और एक बरसों पुरानी दोपहर के पलों-क्षणों को याद करते हैं....और यह महसूस करते हैं कि उस दोपहर के कुछ पलों में उनके बीच अलौकिक प्रेम........हुआ था। ‘प्लेटोनिक लव’ पर केन्द्रित इस खूबसूरत कहानी में भाषा किसी सुंगधित बयार सी प्रवाहित होती है। हर कथा लेखक प्रेम पर अवश्य लिखता हैं पर इस कहानी की अपनी अलग विशिष्टता है। एक गुजरी हुई दोपहर की प्रेम कहानी जिसमें प्रेम का आकर्षण इस हद तक कि वह प्रेतबाधा की तरह लगता है। कहानी में नायक गंधर्व की उपस्थिति सी लगने लगती है।
कहानी ‘खरपतवार’ की शुरूआत थोड़ी सी बोझील है पर जब कहानी लय पकड़ती हैं तो सारे किरदार अपना खाका खिंचते हुए जीवन्त हो उठते हैं तब तक कहानी रीडर-फ्रेण्डली हो जाती है - कहानी का कलेवर दिलचस्प है चरित्र चित्रण लीक से हटकर है- मनीषा के अनुसार नायिका ‘फ्रीक’ हैं --पर सोचने पर मजबूर करती है कि तमाम निंदाई-खुड़ाई करने के बावजूद खरपतवार ना केवल पनपते हैं, लहराते हैं बल्कि वे जाते जाते भी अपने अनचाहे बीज धरती पर छोड़ जाते हैं। जीवन में आने वाले सामाजिक खरपतवार कहानी में अपनी उपस्थिति दर्शाते हैं।
कहानियां अपने युग और परिवेश की पहचान होती है ऐसी कहानियाँ जो आपको कुछ सोचने पर मजबूर करें जो आपकी अंतरात्मा को झकझोर दें। मानवीय जीवन तथा सम्बन्धों को परत-दर-परत उधेड़ती कहानी श्रृंखला में संग्रह की कहानी फाँस को रखा जायगा। यह कहानी भाव-शिल्प और सम्वेदना का अद्भुत समन्वय हैं।
एक स्त्री होकर इस कहानी को पढ़ना एक अत्यंत पीड़ा दायक सच से गुजरना ही हैं निश्चित ही एक स्त्री का इसे लिखना भी उतना ही त्रासद रहा होगा - कहानी एक अविवाहित लड़की का उसके पिता द्वारा ही ही बलात्कार किये जाने की घटना पर केन्द्रित है ,इस कहानी के माध्यम से लिखिका ने एक ऐसा दृश्य रेखांकित किया है जो समाज के उस कड़वे सच को उजागर करता है जिसमें एक स्त्री परिवार में ही कैसे प्रताड़ित और शोषित होती है। यह कहानी पारिवारिक या घरेलू हिंसा को केन्द्रीयता प्रदान करती है। बेहद दर्दनाक इस कहानी के साथ जो फ्रांस पाठक के मर्म में धसती है वह बेटी व्दारा पिता की कपाल क्रिया के प्रहार के साथ निकल जाती है। इस कहानी को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है कि मनीषा का रचना संसार बेहद संवेदनशीलता के साथ आस्था के लुप्त होते, विश्वासके बिखरते सूत्रों की बार-बार तलाश करता है। यह कहानी लेखिका को हिन्दी कथा साहित्य की युवा पीढ़ी में बेहद संभावनाशील लेखिका होने के साथ-साथ संवेदनशील कथा शिल्पी के रूप में भी स्थापित करती है। अन्तिमा के रूप में हमारे समाज की वे स्त्रियों जैसी दामिनी, अरूणा शान बाग, हमारे सामने खड़ी हो जाती है।
संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कहानी है ‘बिगडैल बच्चे’हमारे पूर्वाग्रहों को तोड़ने वाली कहानी है। यह कहानी नयी पीढ़ी की पक्षधरता के साथ हमारे उस भ्रम को तोड़ती है जिसके चलते यह समझ लिया जाता है कि वे फेडेड जींस, हिप्पीकट बाल, चाल या लहजे से श्रृंखल एवं गैर जिम्मेदार या लापरवाह होते हैं --कहानी इस दृष्टिकोण को बदलने में सहायक होती है अंग्रेजी शब्दों को सामान्य रूप से बोलती, अंग्रेजी गानों और गिटार पर थिरकती, बेढंगे कपड़ों ....फैशन का नाम देती। छोटे कपड़े पहनने वाली युवा पीढ़ी के चंद युवा प्रतिनिधि पात्र अचानक रेल में बैठे बहुत से सभ्य सुसंस्कृत लोगों से कहीं अधिक संवेदनशील और सेवाभावी स्वरूप में सामने आते हैं।जो जीवन मूल्यों को आडम्बरी समाज से एकदम अलग हमारे सामने ले आते है
कुरजा स्त्री जीवन के एक अलग रंग अलग पृष्ठभूमि की कहानी है। देश के पिछड़े राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में यह आज भी देखी जा सकती है। कहीं वे कुरजा है कहीं डाकण, कहीं डाईन कही जाती है---कहानी हमारे यहां भी हमारे सामाजिक सरोकारों में विडम्बना की तार-तार सच्चाई को उकेरती है।आज भी डाकनी कह कर ग्रामीण समाज में उन स्त्रियों को मार डाला जाता है जो विधवा या परित्यागता होकर पारिवारिक संपत्ति में दखल रखती है ?इसी स्त्रीयों को घरों में ही देह शोषण के बाद डायनकरार देने के भी मामले देखे जाते है |
मनीषा कुलश्रेष्ठ के इस संग्रह की एक और कहानी उन साधारण लोगों की कहानी हैं जो लोक कला को जीवित रखे हैं। वे राजस्थान की रहने वाली है अतः उनकी कहानियों में राजस्थानी परिवेश भी दिखाई देता है वे वहाँ के सांस्कृतिक परिवेश को भी बेहद सुन्दर तरीके से प्रस्तुत करती है --लोक रंग से सजी कहानी स्वांग का गफूरिया एक ऐसा उच्च चरित्र जो दम तोड़ती लोक कलाओं को बचाने के लिए फ्रीक कहे जा सकते हैं गफूरिया जैसे पात्र कहानी के खत्म होने तक हमारे मर्म को पुकारते हैं। प्रशासनिक दुव्यवस्थाएं और एक कलाकार की कैंसर जैसी बीमारी कहानी को मार्मिक बना देती है। मनीषा की विशेषता यह है कि वे एक जागरूक कथाकार है उनकी यही रचनात्मक ऊर्जा कहानी को सशक्त बनाती है।
संग्रह की परजीवी कहानी इस क्रम में थोड़ी कमजोर कहानी है। थोड़ी अस्पष्ट भी है। पुरूष विमर्श की श्रेणी में रखी जाने वाली कहानी है।
अगर मेरा ईश्वर यानी---कहानी का जिक्र ना करूँ तो बात अधूरी रह जाएगी। मनीषा लिखती है कियह लव रूल्स विदाउट रूल्स पर केन्द्रित कहानी है ,मुझे यह संग्रह की सबसे खूबसूरत कहानी लगती है - किसी लड़की की डायरी की याद दिलाती कहानी की नायिका भी ‘फ्रीक’ हैं क्योंकि वो बिंदास नाचती है गाती है फैशन करती है --अपना जीवन अपनी तरह जीना चाहती है------पर कहानी में जो जिद लड़की को फ्रीक यानी सनकी दिखाती है वह जिद पाठक को अहसास करवाती है कि संग्रह में एक मात्र यही पात्र फ्रीक नहीं है। एक आम लड़की जो सब लड़कियों में शामिल है या उनका प्रतिनिधित्व करती है। यह कहानी आरंभ से अन्त तक हिस्सों में बँटती हैपर कथा के सूत्र विभाजित नहीं होते वे अपने प्रवाह में सतत जुड़े रहते है कहानी की यही विशेषताहै कि -हर पात्र क्रमशः अपने आप में फ्रीक--लगता है,पर होता नहीं है यही वजह है जिससे कहानी अपनी शिष्टता को नहीं खोती। बोल्ड कहा जाने वाला विषय भी अपने सौन्दर्य को बचाए रखता है ----और पाठक प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाता।
कालिन्दी भी एक उल्लेख करने योग्य कहानी है। रेड लाइट एरिया में रहने वाली एक न्यूड मॉडल की कहानी है --संवेदना की दृष्टि से मन को छू लेती है।
इस तरह ग्यारह कहानियों के ये फंतासी और यथार्थ के बीच जीते थे सहज सरल होकर भी फ्रीकी लगने वाले पात्र पाठक को बहुत करीबी लगने लगते हैं।
सच यही है कि .....चरित्रों से ही कहानियाँ बनती हैं लेखिका की रचनात्मक इन पात्रों के सुक्ष्म भाव पकड़ने में कामयाब होती है।
आधुनिक समाज के अन्तसंघर्षों तथा द्वंद्वों से जूझते मनीषा की कहानियों के पात्र तमाम व्यवस्थाओं के खिलाफ विचार जगाते हैं।
एक नए तेवर, चिंतन और दृष्टि से चित्रित इन कहानियों में करूणा, प्रेम की कदात्त एवं पावन भावना, व्यवस्थाओं के राव पेंज, मनुष्य की पीड़ा, स्थापित मान्यताओं को तोड़ती वैचारिक दृष्टि रेखांकित होती है।
गंधर्व गाथा के माध्यम से रखें तो स्त्री लेखन को उसके गहरे सामाजिक सरोकारों से काट कर ना तो पढ़ा जा सकता है ना लिखा जा सकता है। लेखक खाँचों में नहीं बाँटा जा सकता क्योंकि हर लेखक अपने समय, समाज में विच्छन होकर नहीं लिखता। महिला कथाकार भी समाज के बाहर-भीतर से ही अनुभूत होती है अतः उनका लेखन भी बेहतर समाज रचना के सरोकारों से जुड़ा है। उसके सरोकार भी उतने ही गहरे होते हैं जितने किसी भी सक्षम साहित्यकार के होना चाहिए। गंधर्व गाथा चिरंतन सवालों और और वैचारिकता के साथ पाठक के मर्म को छू लेने वाली कहानियों का संग्रह है। मनीषा का भारतीय और ग्रीक मिथकों का समन्वय नयापन देता है। भाषा को प्रवाह ताजगी भरा व देशस्थ शब्दों से समृद्ध है।
कहानी संग्रह की ‘‘एडोनस का रक्त और लिलि के फूल’’ एक घायल सैनिक की कहानी ‘बहुत अच्छी कहानी है.. एक नए कथानक पर लिखी गई कहानी जिसमें एक घायल सैनिक की सेवा में जुटी नर्स और उसके मंगेतर का एक उज्ज्वल चरित्र हमारे सामने आता है। बेहद संवेदनशील कहानी। एक नया विषय और एक वैचारिक पावनता से भरा घटनाक्रम। एक ऐसी कहानी जो पाठक पर स्थायी असर छोड़ती है।
मनीषा के कई संग्रह एवं दो उपन्यास आ चुके हैं -- यह संग्रह भी साहित्य के नए आयाम तलाशेगा।
पुस्तक - गंधर्वगाथा
प्रकाशक - सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य -
स्वाति तिवारी
ईएन-1/9 चार इमली
भोपाल (म.प्र.)


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