पुस्तक समीक्षा
विश्व की भीषणतम औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी का पीड़ाजनित दस्तावेज है
भोपाल गैस कांड में
पीड़ित महिलाओं के दर्द को परत-दर-परत उतारती यह पुस्तक उस त्रासदी के बारे में कही
अनकही को कुछ इस तरह सुनाती है कि पाठक दुर्घटना को पढने के साथ साथ देख भी रहा
होता है। दर्द का एक तीखा नश्तर चुभने लगता है। जिसके त्रासदी से जुड़े सामाजिक,
राजनैतिक, मानवीय और मनोवैज्ञानिक मुद्दे उभरकर सामने आते हैं।
प 12 हईलईफ कॉप्लेक्स चर्च रोड जहांगीराबाद भोपाल
विश्व की भीषणतम औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी का पीड़ाजनित दस्तावेज है
उद्योग मानव सभ्यता में
एक ऐसा अनिवार्य अप्रा.तिक निर्माण है जिससे मानव सभ्यता का विकास होता है। आज
चारों तरफ उद्योगों की भरमार है। सभ्यता के इस निर्माण में मनुष्य खुद ही घिर गया
है। हर शहर गावं कस्बा खेत और जंगल हमें इनकी इकाइयों से भरे दिखते हैं। कहीं काला
धुंआ छोड़ती चिमनी है तो कहीं जहरीला पानी छोड़ता कोई कारखाना। कभी नगर और गांव
नदियों के किनारे बनते थे लेकिन आज ये कारखानों के आसपास बनने लगे हैं। क्योंकि
मानव सभ्यता ने प्र.ति नहीं पैसे की ताकत से पनपने का गुण सीख लिया है। इसलिए यह
त्रासदी या इस जैसी सभी त्रासदियां मानव सभ्यता को चेतावनी हैं कि वे जीवन से ऐसा
खिलवाड़ न करें। वास्तव में भोपाल त्रासदी के बाद बहुत वक्त गुजर गया है। मानव
विकास ने भी इन दुर्घटनाओं से बहुत कुछ सीखने की कोशिश की है। लेकिन अभी भी हम
नहीं कह सकते हैं कि मानव समाज पर कोई खतरा कम हुआ है। उदाहरण के लिए कुछ साल पहले
ही जापान के परमाणु घरों के विस्फोट और फिर विकरण की डरावनी तस्वीर और रिपोर्टिंग
किसे याद नहीं होगी।
इन्हीं कुछ सवालों को
मिला कर भोपाल गैस त्रासदी पर स्वाति तिवारी ने एक किताब लिखी है सवाल आज भी जिंदा
हैं। औद्यागिक त्रासदियों को लेकर इस किताब में जो सवाल उठाए हैं वे आज जिंदा ही
नहीं हैं, समाज और सभ्यता को प्रभावित कर रहे हैं। प्रताड़ित कर रहे हैं। एक
औद्यागिक त्रासदी केवल एक पक्ष को नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि उसके घातक परिणाम
कई स्तरों पर समाज को प्रभावित करते हैँ और नुकसान पहुंचाते हैं।वे दूरगामी भाी
होते हैं। मध्यप्रदेश की राजनधानी भोपाल में घटित 27 साल पहले घटित इस दुर्घटना ने
भोपाल के समाज को आज भी प्रभावित करने के लक्षणों को जीवित बनाए रखा है। स्वाति
तिवारी की पुस्तक में महिलाओं को केंद्रित किया गया है।
पर सवाल आज भी जिन्दा
है? पुस्तक में से डॉ. स्वाति तिवारी
एक सवाल करती हैं कि हम कैसे भूल जाएं कि
भोपाल में एक कारखाना चाकलेट बनाने वाले संयंत्र की तर्ज पर जहर बनाता रहा है। यह
पुस्तक याद दिलाने की कोशिश करती है। यह 27 साल पहले घटी उस दुर्घटना की याद है
जिसके लिए याद रखना सबक लेने के लिए जरूरी है और यह भूलने के खिलाफ एक याद रखने की
लड़ाई है।
पुस्तक स्त्री विमर्श की
धार पर रखकर उसकी सूक्ष्म विवेचना करती है कि कोई भी विभीषिका त्रासदी तभी बनती
है, जब हम उससे सबक नहीं सीखते। यह त्रासदी ना केवल भोपाल में बल्कि विश्व में कई
जगह एक साथ हर पल घट रही है। क्योंकि कोई भी घटना अचानक न घटकर वह क्रमिक रूप से
उस परिणति तक पहुंचती है जब हम उसे दुर्घटना कहते हैं।
यह किताब विश्व की
भीषणतम औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी का पीड़ाजनित दस्तावेज है एक
मनोवैज्ञानिक दस्तावेज जो 27 साल होने के बावजूद न्याय की तारीख का इन्तजार करती
औरतों की पीड़ा को एक तार्किक दस्तावेज में बदलती है।
भोपाल गैस कांड में
पीड़ित महिलाओं के दर्द को परत-दर-परत उतारती यह पुस्तक उस त्रासदी के बारे में कही
अनकही को कुछ इस तरह सुनाती है कि पाठक दुर्घटना को पढने के साथ साथ देख भी रहा
होता है। दर्द का एक तीखा नश्तर चुभने लगता है। जिसके त्रासदी से जुड़े सामाजिक,
राजनैतिक, मानवीय और मनोवैज्ञानिक मुद्दे उभरकर सामने आते हैं।
यह किताब अपने आप में एक
ऐसा बहुमूल्य दस्तावेज है जो गैस पीड़ितों के इतिहास को, उनके सामाजिक सरोकारों को,
उनकी पीड़ाओं को उनकी समस्याओं को उनके सवालों के माध्यम से नई दिशा और नए आयाम
देती है।
इस किताब में वे औरतें
भी शामिल हैं जो हादसे से आहत होने के बाद भी जीवित हैं जो हाशिए पर हैं। यह
दस्तावेज केबल आंकड़ों और रिपोर्टंग की मिलीजुली प्रस्तुति नहीं है। यह
मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय अध्ययन की तरह है जो सोचने पर मजबूर करता है कि
उद्योगों को विकास का आधार मानने के बावजूद हमें सोचना होगा कि उद्योगों का रखरखाव
और उनमें कार्यरत श्रमिकों के जीवन रक्षक प्रबंधों का स्तर कितना और कैसा है?
पुस्तक तमाम सवालों में एक सवाल यह भी रखती है कि हम अब तक नहीं जानते हैं कि मिक
की तरह ऐसे कितने रसायन हैं जिनका एन्टीडोज हमारे पास उपलब्ध नहीं है। त्रासदी के
पहले शिकार मोहम्मद अशरफ की मौत यह सवाल उठाती है कि ऐसे लोगों के परिवारों की
आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा कितनी है? साजिदा बानो के रूप में पुस्तक में वे सभी
मजदूर परिवार और उनकी औरतें हैं जो जोखिम वाले उद्योगों में काम करते हैं।
यह पुस्तक भोपाल त्रासदी
से उपजी मानवीय तकलीफों में स्त्री की भागीदारी का भी दस्तावेज है। 250 पृष्ठों और
छह् खण्डों में बंटी इस पुस्तक का जो बिन्दु सबसे अधिक ध्यानाकर्षित करता है उसके
अनुसार वैज्ञानिक जांचों में सामने आए तथ्यों में यह स्पष्ट संकेत है कि गैस के
असर से कैंसर की आशंकाएं पनपीं और गर्भस्थ भ्रूणों पर दुष्प्रभाव पड़े। गर्भवती
स्त्रियों के मानवाधिकारों का हनन हुआ। औरतों के प्रजनन तन्त्र प्रभावित हुए। कई
औरतें मातृत्व धारण नहीं कर पायीं। औरतों को बांझ बनाने वाली इस घटना के बावजूद 27
वर्षों र्में र्महिला स्वास्थ्य पर केंद्रित कोई महत्वपूर्ण रिसर्च का ना होना,
हमारी व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करता है।
किताब उन लोगों से मिल
कर रची है जो इस त्रासदी के बाद प्रभावित अपने शरीर को केवल ढो पा रहे हैं। ये वे
लोग हैं जो बरसों पहले जीते जी मर गए थे।
बीमारियों से लड़ते-लड़ते, दुखदर्द सहते-सहते, अपनों के गम में तील मरते लोग.... इन
पीड़ितों की आत्मा का हाहाकार और आक्रोश जीवन के संघर्षों र्में र्ऊपर से भले ही
शान्त लगता हो पर उनकी ठण्डी बेजान परतों के नीचे पीड़ा का अथाह समन्दर हिचकोले
खाता लहरा रहा है। देखने सुनने वालों को लगता है कि भोपाल गैस काण्ड में
मरते-मिटते लोगों की कहानी इतिहास के नेपथ्य में चली गई है पर यह पुस्तक उसके पीछे
की कथा कहती है- उन पीड़ित बाशिन्दों की बेबसी और लड़ने की जीने की जीजिविषा की गाथा
है। जिस गाथा का हर पन्ना हमें ना केवल बेचैन करता है बल्कि रुला देते हैं।
यह पुस्तक कहानीकार
स्वाति का एक नया रूप सामने लाती है अति संवेदनशील सामाजिक सरोकारों की लेखक। वास्तव में इस पुस्तक में जो कुछ दर्ज है वह
आने वाले समय में त्रासदी की भयावहता को सुरक्षा के अहसास और जिम्मेदारी को कामय
रखेगी। उन सवालों को जिन्दा रखेगी जो अनुत्तरित ही रह गए हैं। विधवा कॉलोनी भोपाल
में है एक गाली जैसी गली जो विगत 27 सालों से इसी नाम से पहचानी जाती रही। स्वाति
समाज से व्यवस्थाओं से पूछना चाहती है कि यह औरतों का स्थापन था या विस्थापन। वे
चम्पादेवी शुक्ला से मिली उनके साथ कई घण्टे चर्चा की। वे साधना कर्णिक से मिली।
वे कभी मौत के खण्डहरों में घुमी तो कभी विधवा कॉलोनी, नीलम पार्क, यादगारे
शाहजहानी पार्क की बैठकों में गई अपनी डायरी और अपने कैमरे के साथ। किताब के आखिरी
के 20 पन्ने जिनमें औरतों के तब से लेकर आज तक के हालात फैले हैं जिनके लिए लेखक
ने लिखा जहां शब्द शून्य है। जब त्रासदी को मानव मन और मानव संसाधन संभाल नहीं
पाते तो वह संज्ञाशून्य हो जाता है। यही कारण है कि इतने समय बीतने के साथ इस त्रासदी
के कई अनुछुए पहलुओं को स्वाति तिवारी द्वारा उठाया जा सका है।
पुस्तक में विधवा कॉलोनी
के खुले आंगन में एक अदालत लगती है जहां गुंगी बहरी एक बच्ची जो हादसे के शिकार
माता-पिता की सन्तान है वह गुहार लगाती है कि मुजरिम हाजिर हो। यह अध्याय आक्रोश
और पीड़ा के उत्पीड़न के लावे से भरा हुआ है। इसमें सत्ताइस साल के मानसिक सन्तापों
का शब्दशह् आक्रोशित विलाप करती तीन पीढ़ियों के दर्द व गुस्से का लावा स्तब्ध कर
देता है। इस खुली अदालत में पीड़ित औरते ही वकील हैं, वे ही जज हैं और भुगतभोगी तो
वे हैं ही।
पुस्तक में व्यवस्थाओं से तमाम सवाल किए गए हैं- जिनका अर्थ है कि
मुजरिम कौन है आखिर? अन्तहीन दर्दनाक कहानियों को भोपाल में किसने रचा?
पुस्तक - सवाल आज भी
जिन्दा है?
लेखक - डॉ. स्वाति
तिवारी
मूल्य - 495 रुपये
प्रकाशक - सामयिक
प्रकाशन, दिल्ली।
रविन्द्र स्वप्निल
प्रजापति
टॉ

This tragedy has prolonged too long for too many years....27 years and days are counting. Has this book been read or reviewed by government officials of Madhya Pradesh governments? Looks like every one responsible in government cadre is turning a blind eye to this human tragedy of unspeakable emotions. It's time that this book should be made available so that officials sitting in responsible positions, who can help the victims, read and start implementing plans to help the victims. Ashok Tiwari, Associate Professor in Sociology (Retd.), M.P. Educational Services. San Francisco.
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